श्रीकृष्ण द्वारा ब्रह्मा जी का मोह भंग लीला
कृष्ण द्वारा ब्रह्मा का मोह भंग लीला
(श्री कृष्ण वन भोजन)
भगवान श्री कृष्ण जी ने ग्वाल बालों के साथ वन में भोजन करते हैं। आप ये सोच लो आज बालकृष्ण पार्टी करने जा रहे हैं और लीला का आनंद लीजिये। भगवान ने अपना प्रशाद ग्वाल बालों को खिलाया हैं और उनका भोजन खुद किया हैं। यह करके भगवान ने बताया हैं की मेरे लिए कोई छोटा बड़ा नहीं हैं। भगवान ने ग्वाल बालों की झूठन खाई हैं। सभी ग्वाल बाल अपने घर से सुंदर भोजन बना कर लाये हैं। सभी अपना अपना भोजन निकाल कर खा रहे हैं। भगवान बोले की मैं तुम्हारे साथ भोजन नहीं करूँगा। भगवान बोले वन भोजन का ऐसे आनंद नही आएगा। आप अपनी वस्तु मुझे खिलाओ और मैं अपनी वस्तु आपको खिलाऊंगा।
फिर भगवान उठे और अपना भोजन ग्वाल बालों को अपने हाथ से करवा रहे हैं और उनके हाथ से स्वयंं भोजन खा रहे हैं। जब मनसुखा के पास भगवान गए तो मनसुखा से बोले- क्यों रे ब्राह्मण तू भी कुछ लाया हैं क्या ?
मनसुखा बोले क्यू रे लाला मेरी मैया कुछ बनाना नही जानती हैं क्या ?मैं भी लाया हूँ।
मिटटी के पात्र में वो वस्तु लेकर आये थे। मनसुखा ने थोड़ी सी भगवान के हाथ में रख दी। भगवान ने खा ली। भगवान को बहुत पसंद आई।
भगवान बोले की थोड़ी सी और दियो भैया। भगवान ने फिर खा ली । भगवान ने फिर माँगा थोड़ी सी और दीजो। मनसुखा ने फिर दे दी। अबकी बार मनसुखा बोले की कान्हा सब तेरे को दे दूंगा तो मैं क्या खाऊंगा?
भगवान बोले बात तो ठीक हैं। अच्छा ये बता इसका नाम क्या हैं? मनसुखा बोले इसका नाम हैं वृन्दावनी!
वृन्दावनी नाम सुनते ही भगवान का ह्रदय गदगद हो गया। भगवान कहते हैं भाई मनसुखा! तू मेरा सारा भोजन ले ले पर मेरे को ये वृन्दावनी खाने को दे दे। वृन्दावनी और कुछ नही हैं भैया ये हैं कढ़ी।
कढ़ी गोपाल दुसरो नही कोई। बांके बिहारी जी को राज भोग में कढ़ी का भोग लगता हैं।
( ब्रह्मा का ग्वाल बाल और बछड़ों का ब्रह्म लोक लेकर जाना)
जब ब्रह्मा जी ने देखा की ये कैसा भगवान हैं जो ग्वाल बालों के साथ भोजन कर रहे हैं। ब्रह्मा जी वहां आये और सभी ग्वाल बाल और बछड़ो को लेकर अपने लोक में चले गए। भगवान जब भोजन करके उठे तो देखा की ग्वाल बाल और बछड़े कहाँ हैं? भगवान समझ गए सब करतूत इस ब्रह्मा की हैं।
जितने बछड़े और ग्वाल बाल हैं भगवान ने उतने ही रूप धारण कर लिए। जब कुछ समय पश्चात ब्रह्मा ब्रज में देखने आये तो सोचते हैं की कृष्ण की लीला बंद हो गई होगी। क्योंकि सभी ग्वाल बाल और बछड़े तो मेरे पास हैं। लेकिन क्या देखते हैं की भगवान तो वैसे ही फिर लीला कर रहे हैं। वही ग्वाल बाल साथ हैं और वही बछड़े। ब्रह्मा को बड़ा आश्चर्य हुआ। जाकर अपने लोक में देखा तो वहां भी ग्वाल बाल और बछड़े हैं। फिर पृथ्वी पर आये। पर यहाँ भी सब हैं। जब ब्रह्मा ने दो चार चक्कर ब्रह्म लोक से पृथ्वी लोक और पृथ्वी लोक से ब्रह्म लोक के लगाये तो बड़े परेशान हो गए। ब्रह्मा जी महाराज भगवान के पास आये हैं।
(ब्रह्मा द्वारा कृष्ण जी की स्तुति)
ब्रह्मा ने भगवान की सुंदर ४० श्लोकों में स्तुति की है। ब्रह्मा ने कहा की प्रभु आपको प्राप्त करने के मार्ग अनेक अनेक हैं लेकिन मेरी समझ में कोई पथ आया हैं तो वह भक्ति मार्ग हैं। जो लोग आपकी भक्ति का तिरस्कार करके ज्ञान के पीछे भागते हैं तो ऐसा हैं जैसे कोई व्यक्ति भूसी कूटे और सोचे इसमें से अन्न प्राप्त हो जाये तो कभी नहीं होगा। वह व्यर्थ ही परिश्रम कर रहा हैं। इसी प्रकार भगवान को पाने के लिए कोई मार्ग श्रेष्ठ है तो
भक्ति मार्ग है। भक्ति जन्म देती हैं ज्ञान और वैराग्य को। भक्ति मूल हैं। आज भक्ति की महिमा ब्रह्मा ने बताई हैं। मैं आज आपके चरण कमलो में ये प्रार्थना करता हूँ की अगली बार मुझे जन्म देना तो इस ब्रज में ही देना। कितने बड़भागी हैं ये ब्रजवासी जो आपको भगवान नही मानते हैं अपना मित्र मानते हैं। मैं इनको भी प्रणाम करता हूँ। ब्रह्मा ने ग्वाल बाल और बछड़े भगवान को प्रदान किये हैं।
भगवान ने अघासुर को भी मारा था। सभी ग्वाल बाल ने एक वर्ष के बाद घर जाकर बताया की आज लाला ने अघासुर को मारा हैं।
बाल कृष्ण की जय !!